फरीदाबाद /-सतयुग दर्शन ट्रस्ट का वार्षिक रामनवमी यज्ञ महोत्सव, आज फरीदाबाद, स्थित सतयुग दर्शन वसुंधरा पर प्रात: 8.00 बजे सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ व रामायण के अखंड पाठ के साथ आरंभ हुआ। आरम्भिक विधि के उपरांत सत्संग में उपस्थित सजनों को भाव-स्वभाव परिवर्तन क्रान्ति के अंतर्गत आत्मनिरीक्षण करते हुए विकार वृत्तियों को त्याग अपनी वृत्ति-स्मृति-बुद्धि और भाव-स्वभाव का ताना-बाना सदा निर्मल अवस्था में साधे रखने का आवाहन दिया गया।
इस संदर्भ में अंतर्मुखता एवं बहिर्मुखता का विवेचन करते हुए यह स्पष्ट किया गया कि जो अंतर्मुखी है वह परमात्मा के ध्यान में लीन हैं और यथार्थतापूर्ण निर्विकारी जीवन जीने में पूर्णतः सक्षम हैं। वहीं जो मनुष्य बहिर्मुखी हैं, उसका मन बाह्य जगत में लगा हुआ है और वह बाह्य विषय विकारों में ही रुचिशील हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि उसका ध्यान अन्तर्जगत से हटकर बाह्य जगत की ओर है। इसलिए काम वृत्तियों के दुष्प्रभाव के कारण वह जगतीय द्वि-द्वेष युक्त भाव-स्वभावों में उलझा हुआ है। फिर वह जीवन में जो कुछ भी करता है वेद विहित् गुरुमत के विपरीत मनमत के अनुसार ही कर्ता भाव से करता है। इससे स्पष्ट होता है कि ऐसे मनुष्य निष्कामता का भाव छोड़ काम, क्रोध, लोभ, मोह व अहंकार अपना असत्य-अधर्म अनुसार जगत में विचरते हुए अपना यथार्थ जीवन लक्ष्य भूल चुके हैं। यही भूल तो मोक्ष प्राप्ति के स्थान पर जन्म मरण के चक्रव्यूह में उलझने जैसी दुखद बात है। ए विध ऐसे अज्ञानमयी अवस्था में उलझे हुए इंसानों को इस संदर्भ में स्वयंमेव अपना जायज़ा लेने को कहा गया।
इसी क्रम में आत्मनिरीक्षण को व्यवहारिक रूप देने हेतु विभिन्न निर्विकारिता के प्रतीक भाव-स्वभावों व विकृत भाव-स्वभावों का विस्तारपूर्वक विवेचन प्रस्तुत करते हुए बताया गया कि भोग-विलास में आसक्ति त्याग विरक्ति भाव अपनाओ, पतन से बचने हेतु अहंकार रहित हो जाओ, सभ्य एवं मर्यादित आचरण का प्रतीक बनने हेतु अश्लीलता त्याग शील एवं शिष्टता अपनाओ। यही नहीं उत्तम मानवीय प्रवृत्ति में ढलने हेतु क्रूरता और हिंसा जैसी विनाशकारी प्रवृत्ति त्याग मन-वचन-कर्म से किसी को भी कष्ट न पहुँचाने का संकल्प लो। ऐसा सुनिश्चित करने हेतु आध्यात्मिक प्रवृत्ति में ढल भौतिक जगत में निरंतर आज़ाद बने रह अपनी इन्दिर्यों को विषय विकारों से ग्रस्त होने से बचा लो। जानो कर्मठता ही सफलता का आधार है इसलिए आलस्य और अकर्मण्यता के स्वभाव से ऊपर उठ कर्म योगी बनो। यही एक मात्र युक्ति है सकारात्मकता में ढल अपने जीवन को निर्विकारिता में साधे रखते हुए सदा आत्मस्वरूप में स्थित रहने की और ए विध सर्वशक्तिमान परमेश्वर की सर्वव्यापकता के सत्य को जान समभाव-समदृष्टि अनुसार जगत में निर्लिप्तता से विचरते हुए अपना अमोलक जीवन सफल बनाओ। इसी के साथ सामूहिक रूप से विश्वस्तर पर हर मानव के नैतिक उत्थान हेतु कहा गया –
“भाव-स्वभाव परिवर्तन क्रांति ज़िंदाबाद”
अंततः इसी के साथ कहा गया कि अंतर्घट में युग परिवर्तन के निहित क्रांति छेड़ सतयुगी इंसान बनो।





