फरीदाबाद /-सतयुग दर्शन वसुन्धरा में आयोजित राम नवमी यज्ञ महोत्सव के द्वितीय दिवस पर भाव – स्वभाव परिवर्तन क्रांति के अंतर्गत सजनों को ‘सजन भाव’ जैसे सर्वश्रेष्ठ भाव की महिमा बताते हुए कहा गया कि सजन वह श्रेष्ठ अर्थात् भला मनुष्य है जो जनहित को समझने वाला, मानव-धर्म अनुसार, मनुष्यता के स्वभावों से अलंकृत हो यानि हर विध् विचारशील, बुद्धिमान व विद्वान है। ऐसे सजन पुरुष की वाणी में माधुर्य और मन में विषयों में प्रवृत्त होने की क्षमता नही होती तभी वह जितेन्द्रिय व निर्विकारी कहलाता है।
सजन भाव को जीवन में अपनाने की महत्ता का वर्णन करते हुए बताया गया कि इसके अनुशीलन द्वारा मनुष्य का हृदय निरंतर निर्विकार अवस्था में स्थित हो जाता है, जो अपने आप में मृत्युलोक पर फतह प्राप्त कर अमरता का प्रतीक बनने जैसी सर्व महान उपलब्धि है। अतः समय रहते इस श्रेष्ठ मानसिक स्थिति को प्राप्त करने हेतु शास्त्रविहित युक्ति को यथावत धारण कर उसे अविलम्ब व्यवहार में लाने का आह्वान दिया गया, जिससे मनुष्य सत्य धर्म के निष्काम रास्ते पर स्थिर बने रह मृत्युलोक पर विजय प्राप्त करने के योग्य बन सके। जैसा कि कहा गया है-
“सजनों सजन शब्द चलाओ जित्तो मृतलोक नूं”
आगे सजन भाव को व्यवहारिक रूप से जीवन में अपनाने की विधि बताते हुए कहा गया कि सर्वप्रथम सजन बनने के लिए संकल्प अर्थात इच्छा एवं इरादा स्वच्छ करना अत्यंत आवश्यक है। संकल्प को स्वच्छ बनाए रखने हेतु काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार के कुचक्र से स्वयं को बचाना आवश्यक है। इस हेतु मनुष्य को अपने मन में प्रत्येक जीव यानि अपने घर, परिवार एवं समस्त संसार के प्रति सजनता का भाव स्थापित करते हुए सबको “सजन जी” कहने की प्रवृत्ति अपनानी चाहिए।
इस पर बल देते हुए कहा गया कि सजन शब्द बड़ा महान शब्द है इसलिए अविलम्ब जिव्हा से सबको सजन बुलाना आरंभ कर देना चाहिए ताकि अपने यथार्थ स्वरूप की पहचान की जा सके। यहाँ यह भी जानो कि सजन शब्द बुलाने से सारा ब्रह्माण्ड एक सजन हो जाएगा और मौत का भय नहीं रहेगा। यही नहीं सजन शब्द बुलाने से जब बाकी कोई संकल्प नहीं रहता और स्वयंमेव एक निगाह एक दृष्टि होकर दिव्य दृष्टि की प्राप्ति हो जाती है तब मनुष्य एक आत्मा होकर परमात्मा से मेल खाकर ज्योति स्वरूप जो अपना आप है उसकी पहचान कर रौशन हो जाता है । इसी सत्य को पुनः स्मरण कराते हुए कहा गया—
“सजन है कुल चानणा, सजन है कुल दीपक”
अंत में हर सजन से करबद्ध प्रार्थना कि इन जीवन उद्धारक तथ्यों को दृष्टिगत रखते हुए, गहराई से आत्मनिरीक्षण करे और सजन भाव पर स्थिरता से समरस बने रहने हेतु अपने भाव स्वभाव के अंतर्गत पाई हुई कमजोरियों को त्याग, अविलम्ब समभाव-समदृष्टि की युक्ति को प्रसन्नतापूर्वक अपना ले। इस तरह ऐसा पुरुषार्थ दिखा पुन: नौजवान युवावस्था को धारण कर, उच्च बुद्धि उच्च ख़्याल हो जाए। अंत में हर सजन को विवेकशीलता से अपने अंतर्घट से विकृत भाव स्वभाव त्याग पुनः मनुष्यता का यथार्थत: प्रतीक बनने हेतु उत्साहित करते हुए कहा गया कि जानो ऐसा सुनिश्चित करने पर ही आप आत्मनिर्भरता व आत्मविश्वास के साथ निर्विकारिता पूर्ण स्वतंत्र जीवन जीने के योग्य बन सकते है और जीवन का यथार्थ लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करने में सफल हो सकते है।





